: चहलारी नरेश का बलिदान देश व समाज के लिए प्रेरणाश्रोत
Tue, Jun 13, 2023
वीरता की कहानियां पढ़कर चहलारी नरेश को नमन
165वें बलिदान दिवस पर श्रद्धांजलि सभा का आयोजन
शहीद महाराजा बलभद्र सिंह की जीवन गाथा को वर्तमान पीढ़ी के लिए अनुकरणीय बताते हुए पुष्पांजलि अर्पित की
बहराइच/पयागपुर। सेनानी भवन में मंगलवार को चहलारी नरेश बलभद्र सिंह प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के अमर शहीद की शहादत दिवस उनके चित्र पर माल्यार्पण कर सेनानी उत्तराधिकारी संगठन की ओर से मनाई गई। कार्यक्रम की अध्यक्षता संगठन महामंत्री एवं शहीद महाराजा बलभद्र सिंह के उत्तराधिकारी आदित्य भान सिंह ने किया। संरक्षक अनिल त्रिपाठी ने कहा कि महसी (बहराइच) प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की बात जब छिड़ती है, चहलारी नरेश बलभद्र सिंह की वीरता जेहन में कौंध उठती है। उनकी वीरता का गवाह 13 जून 1858 को बाराबंकी जिले में रेठ नदी के तट पर अंग्रेजों से लड़ा गया निर्णायक युद्ध है। उन्होंने अवध के विद्रोह की अगुआई करते हुए केवल 18 वर्ष की आयु में अद्भुत पराक्रम का परिचय दिया था। आदित्य भान सिंह ने कहा कि राजा बलभद्र सिंह का जन्म 10 जून सन 1840 को बहराइच के चहलारी राज्य (अब बहराइच जिले के महसी क्षेत्र) में हुआ था। उनके पिता का नाम राजा श्रीपाल सिंह और मां का नाम महारानी पंचरतन देवी था। चहलारी रियासत पर कश्मीर से आए रैकवार राजपूतों का शासन होता था। राजा श्रीपाल साधु प्रवृत्ति के थे और अल्पायु में ही कुंवर बलभद्र का राज्याभिषेक कर राज्य कार्य से विरत हो जाना चाहते थे। लेकिन बलभद्र उन्हें समझा-बुझाकर उनके प्रस्ताव को अस्वीकार कर देते थे। अंततः बलभद्र सिंह किशोरावस्था में ही चहलारी के राजा बने। बाल्यकाल से ही निडर और पराक्रमी बलभद्र सिंह युद्ध कौशल में भी महारथी थे। उदारता और संवेदनशीलता के कारण ही राज्य की जनता पूरी तरह से शोषण मुक्त होकर सुख शांति से जीवन यापन कर रही थी। सेना में प्रत्येक जाति धर्म के बहादुर युवकों को भर्ती किया गया, जिसका नेतृत्व अमीर खां कर रहे थे। भिखारी रैदास जैसे बहादुर योद्धा भी सेना में ओहदेदार थे। सेनानी उत्तराधिकारी संगठन के प्रदेश महामंत्री रमेश मिश्रा जो राष्ट्रीय सम्मेलन आसाम राज्य के गोहाटी में आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने जा रहे हैं और ट्रेन में सफर करते हुए टेलीफोन पर सभा को सम्बोधित करते हुए कहा कि इतिहासकारों के अनुसार, भगवान राम के अनुज भरत के वंशज रैकवार क्षत्रियों का उद्भव स्थल जम्मू कश्मीर के कश्मीर घाटी के रैका गांव माना जाता है। राकादेव रायक रैकवार वंश के प्रथम पुरुष थे। 1414 ई. में रैकवार वंश के डूंडेशाह, प्रताप देव और भैरवानन्द नामक तीन भाई बाराबंकी के राम नगर कस्बे में आए। जहां भर राजा का शासन था। चाचा भैरवानन्द के बाद उनके भतीजे और प्रताप देव के पुत्र शालदेव व बालदेव ने अल्प समय में ही अपनी निष्ठा और ईमानदारी से राज्य को बुलंदी पर पहुंचा दिया। बाद में दोनों बहादुर भाइयों ने राजा की हत्या कर सत्ता हथिया लिया। सन 1450 में बालदेव रामनगर रियासत के राजा हुए तो उन्होंने शालदेव को घाघरा नदी के उस पार बौंडी (बहराइच) रियासत का राजा बना दिया। समाजसेवी अजय शर्मा ने कहा कि ओबरी के महासमर में राजा बलभद्र के वीरगति प्राप्त होते ही का्रन्तिकारी भागने पर विवश हुए और अंग्रेजों की विजय हुई। बेगम हजरत महल उनके पुत्र बिरजिस, राजा सवाई हरिदत्त सिंह, गोंडा नरेश राजा देवी बख्श सिंह, रायबरेली के राणा बेनी माधव सिंह समेत तमाम क्रातिन्कारी नेपाल के दुर्गम पहाड़ियों में स्थित दांग-देवखर चले गए। पूरे अवध पर कब्जा करके अंग्रेजों ने बौंड़ी का किला ध्वस्त करा दिया और चहलारी राज्य को चार भागों में विभाजित कर 52 गांव का जंग बहादुर राणा, 08 गांव थानगांव के भया, तीसरा भाग में 2200 बीघा मुनुवा शिवदान सिंह और शेष चौथा भाग पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह के वंशजों को दे दिया। इस मौके पर समाज सेवी पुण्डरीक पाण्डेय, कुंवर शिवेंद्र सिंह, अगम सिंह, अथर्व मिश्र, निकुंज मिश्र ने वीर रस की पंक्तियों के साथ अपने विचार रखे तथा शहीद महाराजा बलभद्र सिंह की जीवन गाथा को वर्तमान पीढ़ी के लिए अनुकरणीय बताते हुए पुष्पांजलि अर्पित की। वहीं पयागपुर में अट्ठारह वर्षीय आजादी के दीवाने अमर शहीद चहलारी नरेश महाराजा बलभद्र सिंह रैकवार के 165वें बलिदान दिवस पर अखिल भारतीय गौरवशाली क्षत्रिय महासभा फाउंडेशन के प्रदेश महासचिव विनय कुमार सिंह ‘‘गुड्डू ‘‘ कलहंस के संयोजकत्व में आओ बलिदानों से सीखें पर आधारित प्रेरणा, संकल्प गोष्ठी उनके निजि निवास रुकनापुर, नगर पंचायत पयागपुर में नागेन्द्र सिंह कुशवाहा मण्डलीय अध्यक्ष देवीपाटन मंडल के अध्यक्षता में आयोजित किया गया। कार्यक्रम में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं संगठन प्रभारी उत्तर प्रदेश विनय सिंह मुख्य रूप से शामिल हुए। गोष्ठी की शुरुआत चहलारी नरेश महाराजा बलभद्र सिंह रैकवार की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित करते हुए सामूहिक शैल्यूट देकर किया गया। उक्त अवसर पर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनय सिंह ने कहा कि चहलारी नरेश महावीर बलभद्र सिंह की शौर्य गाथा सिर्फ भारत में ही नही बल्कि विश्व विख्यात है। चहलारी नरेश का बलिदान देश व समाज के लिए प्रेरणाश्रोत है। उन्होंने वर्तमान सांसद कैसरगंज से महाराजा बलभद्र सिंह रैकवार महाविद्यालय परिसर बनकटा पयागपुर में चहलारी नरेश बलभद्र सिंह रैकवार की मूर्ति लगाने व उनके नाम से उद्यान बनाने की पुरजोर अपील की ताकि क्षेत्रीय शिक्षार्थी व जनमानस उनकी स्मृति दिवस पर श्रद्धा सुमन अर्पित कर सके एवं उनके जीवन दर्शन तथा ब्यक्तित्व व कृतित्व से भावी पीढ़ी में भी राष्ट्रीय सोंच व सामाजिक सोंच विकसित होती रहे। प्रदेश महासचिव विनय कुमार सिंह गुड्डू कलहंस ने कहा कि राजा बलभद्र सिंह रैकवार सिर्फ भारत ही नही बल्कि सम्पूर्ण विश्व के प्रकाश स्तंभ थे। उनके रण कौशल से ब्रिटिश साम्राज्य के छक्के छूट गए थे! मण्डलीय अध्यक्ष ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि बहादुरी के मिशाल भारतीय (अवध) सेनापति चहलारी नरेश बलभद्र सिंह रैकवार 13जून 1858 में शहीद हो जाने के बाद भारत के स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने नेपालगंज में शरण ली थी। उन्होंने कहा कि चहलारी नरेश वीर बलभद्र सिंह सर कट जाने के बाद भी कई घंटो तक अंग्रेजी सेना से युद्ध करते रहे। यह एक अनोखी तथा आश्चर्यजनक दृश्य था! गोष्ठी को पूर्व प्रधान विपिन शाही, रामचन्द्र सिंह, राज कुमार सिंह एडवोकेट, दुख हरण सिंह, हुकुम सिंह, अमरजीत सिंह सहित कई लोगों ने सम्बंधित किया। इसके अलावा संजय सिंह जनवार, नितिन सिंह, संतोष शर्मा, नवीन पाल, कुलदीप सिंह सहित कई लोग शामिल रहे।
घाघरा के तीर चल कर देख लिख दिए उस वीर ने जो लेख
कैसरगंज, बहराइच। 1857 की क्रांति के अमर बलिदानी चहलारी नरेश वीर बलभद्र सिंह का 165 वां बलिदान दिवस किसान पी.जी. कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ.सत्यभूषण सिंह के नगर पंचायत कैसरगंज के ग्राम गुथिया स्थित आवास वेणुकुंज में मनाया गया। बलभद्र सिंह के नेतृत्व में 12 और 13 जून अट्ठारह सौ अट्ठावन को नवाबगंज बाराबंकी में रेठ नदी के तट पर अंग्रेजों के विरुद्ध जोरदार मुकाबला हुआ था। इस युद्ध में अवध की सेना का नेतृत्व करते हुए बहराइच जिले के चहलारी नरेश वीर बलभद्र सिंह ने अंग्रेजी सेना का मुकाबला करते हुए मात्र अट्ठारह वर्ष और तीन दिन की आयु में वीरगति को प्राप्त हुए थे। आज भी इस तरुण बलिदानी की वीर गाथा यहां के लोगों में जोश भर देती है। इस अवसर पर एक विचार गोष्ठी और श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। जिसकी अध्यक्षता पूर्व सैनिक विजय कुमार सिंह पदुम ने की। कार्यक्रम के संयोजक सत्यवीर सिंह रहे। डॉ.सत्यभूषण सिंह ने साहित्यकार सत्यव्रत सिंह के प्रबंध-काव्य चहलारी नरेश वीर बलभद्र सिंह की यह पंक्तियां सुनायीं,‘घाघरा के तीर चल कर देख लिख दिए उस वीर ने जो लेख, उन्हें पढ़कर हो गए कवि धन्य, वीर थे बलभद्र सिंह अनन्य‘ इस अवसर पर बीजेपी आईटी विभाग के मंडल संयोजक रूपेश कुमार सिंह जीतू, युवा समाजसेवी विवेक कुमार सिंह रैकवार, शिक्षास्थली फाउंडेशन के डायरेक्टर डॉ. पंकज शुक्ला, अरुण कुमार सिंह सोनू, अरविंद कुमार सिंह रैकवार, मोहित कुमार सिंह चंदन, उच्च न्यायालय के अधिवक्ता अभिषेक सिंह सूरज, विश्वेंद्र प्रताप सिंह गौरव, समर विजय सिंह, पंकज सिंह रैकवार विवेक कुमार सिंह बिक्कू सहित अनेक लोग उपस्थित थे।
: फोन पर पत्नी से विवाद के बाद युवक ने की आत्महत्या
Tue, Jun 13, 2023
घर में फंदा लगाकर युवक ने दी जान
बहराइच। जिले के उर्रा बाजार निवासी एक युवक ने मंगलवार को फंदा लगाकर जान दे दी। पत्नी की सूचना पर एसपी ने पुलिस टीम को गांव भेजा। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। मोतीपुर थाना क्षेत्र के ग्राम पंचायत उर्रा बाजार निवासी जितेंद्र निगम 33 पुत्र छोटन्ने निगम मंगलवार तड़के घर में फंदा लगाकर जान दे दी। परिवार के लोग अंतिम संस्कार की तैयारी कर रहे थे। तभी पुलिस अधीक्षक का फोन मोतीपुर थाने में पहुंच गया। लुधियाना में रह रही पत्नी की शिकायत पर मोतीपुर पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। प्रभारी निरीक्षक मुकेश कुमार सिंह ने बताया की युवक ने फंदा लगाकर जान दी है। पत्नी लुधियाना में रह रही है। पत्नी की सूचना पर शव पोस्टमार्टम के लिए भेजा गया है। तहरीर मिलने पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। परिवार के मुताबिक रात में फोन पर पत्नी से विवाद के बाद युवक ने आत्महत्या की है।
: एैसन वीर कबंहु नहि देखा जाको रूण्ड करै कृपान‘‘
Mon, Jun 12, 2023
‘‘बड़ा बहादुर बलभद्र था जग मा होई गा नाम तोहार‘‘
बहराइच। आर्याव्रत के उत्तरी छोर की सांधी माटी के कण-कण आजादी के दीवानों के यशोगान की अनुभूतियां पटी पड़ी है। वसुन्धरा पर बहे शहीदों के लहू उनके सपनों को बारम्बार श्रद्धांजलि अर्पण के लिए सदैव प्रेरित करते है। इन्हीं शहीदों की श्रृंखला में एक अहम नाम शुमार है सुकुमार सम्राट बलभद्र सिंह। बलभद्र सिंह एक ऐसे असाधारण शूरवीर सम्राट योद्धा का नाम है जिन्होंने अवध की सरजमी पर कम्पनी सरकार के बढ़ते कदम को रोक दिया था। आधुनिक सैन्य साजो सामान से लैस होने के बाद भी तरूण बलभद्र सिंह के सामने टिक नहीं पायी और अंग्रेजी सेना और शासक को मोर्चा छोड़कर भागना पड़ा। एक तरीके से ब्रितानियां हुकुमत की पहली शर्मनाक हार थी। तभी तो अंग्रेज फौज के प्रधान सेनापति सर होपग्रांट, मेजर हडसन, कर्नल सर कैम्पवेल, डैली और बिग्रेडियर हार्स फोर्ट को बलभद्र सिंह के वीरता को सलाम कर उनके युद्ध कौशल का मुक्त कंठ से प्रशंसा करने को विवश होना पड़ा। लंदन टाइम्स के रिर्पोटर सर विलियम रसल ने ए डायरी माई लाइफ इन इण्डिया 1857-1858 में बलभद्र सिंह के वीरता के कसीदे गढ़े।
बात सन 1957 की है। कम्पनी सरकार अपने सैनिक अभियान के बलबूते यूपी के सूबो-दर सूबों पर विजय प्राप्त कर अपने अधिपत्य में लेे रही थी। अंगरेजी फौज शासकों ने अवध के नवाब वाजिद अली शाह को 13 फरवरी 1856 में गिरफ्तार कर कलकत्ता जेल में नजरबंद कर लिया था। बेगम हजरत महल नन्हें बेटे विरजीश कदर को लेकर अंग्रेजी फौजी शासकों को चकमा देकर महल से भाग खड़ी हुई। उनके साथ उनके खास सिपहसलार मम्मू खां भी थे। बेगम के पालकी की रक्षा के लिए उनके अपने भरोसेमंद कुछ सैनिक भी थे।
बेगम दुर्गम रास्तों का सफर तय कर घाघरा नदी को पार कर भिठौली होते हुए बौण्डी आ गई। उन दिनों बौण्डी रियासत की कमान राजा हरदत्त सिंह के हाथ थी। हरदत्त सिंह ने बेगम को प्रश्रय दिया। बेगम वेवश होकर भी हार नहीं मानी। वे अंगेजों के विजय रथ को रोकना चाहती थी किन्तु अंग्रेजों की विशाल सेना और युद्ध के आधुनिक साजों के सामने बेगम का टिक पाना असम्भव था। विषम विपरीत परिस्थितियों में बेगम ने हौसले को टूटने नहीं दिया। दिमागी जद्दोजेहाद के बाद बेगम ने अंगेजों से मुकाबले के लिए एक नये युक्ति को आयाम दिया। बेगम ने अवध सूबे को सभी जमीदार एवं छ़त्रपों को मार्मिक पत्र भेजकर बौण्डी में तत्काल बैठक बुलाई। इसके लिए बेगम ने ताल्लुकेदारों एवं राजाओं को हरकारो के माध्यम से पत्र भेजा। बेगम के पक्ष के मजमून से रियासती छत्रप् मुश्किलों के आगाज की आहट समझ गए। पत्र भी बहुत मार्मिक था। पत्र पाकर तुलसीपुर की रानी ईश्वरीदेवी, भयारा के यासीन अली, हरदोई रूइया के राजा नरपति सिंह, बिठूर के नाना साहब, नानपारा के नवाब कल्लू खां, महोना के दिग्यविजय सिंह, राजा चरदा के जगजोत सिंह, फैजाबाद के मौलवी अहमद शाह उर्फ डंका शाह, संड़ीला हरदोई के चौधरी हशमत अली, चंदापुर के राजा शिवदर्शन सिंह, कटियारी के हरदेव बख्श सिंह, राजा हनुमन्त सिंह, कमियार राजा शेर बहादुर सिंह अमेठी के राजा माधव सिंह, निजामाबाद के फिरोज शाह, धौरहरा के राजा जांगड़ा, रायबरेली शंकरगढ़ के राजा बेनीमाधव सिंह, भटुआ मऊ के तजमल हुसैन खां, रामनगर के राजा गुरूबक्श सिंह, अयोध्या के राजा मानसिंह, गोण्डा के राजा देवीबक्श सिंह, खजूर गांव के राजा रघुनाथ सिंह, इकौना के राजा उदित प्रकाश सिंह, राजापुर के दुनिया सिंह, बरूवा के गुलाब सिंह, रेहुवा के रघुनाथ सिंह, बौण्डी राजा हरदत्त सिंह तयशुदा समय पर पहुंच गए।
चहलारी सम्राट बलभद्र सिंह उन दिनों लघु अनुज छत्रपाल को व्याहने शिवपुर गए हुए थे। जनवासे में बेगम के प्रमुख हरकारा मुख्तार शिवपुर पहुंचकर बेगम की पाती सौंपी। बारात की विदाई दूसरे दिन होनी थी और बैठक भी उसी दिन मुकर्रर थी। सो बलभद्र सिंह देशहित को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए बैठक में भाग लेने का निर्णय लिया। बारात के विदाई का जिम्मा काका हीरा सिंह के जिम्मे कर बलभद्र सिंह बौण्डी के लिए प्रस्थान कर दिया।
अवध की मल्लिका के नेतृत्व में पधारे राजाओं एवं जमीदारों की बैठक शुरू हुई। सभी का एक ही मत था कि अवध को प्रत्येक दशा में अंगेजी शासन से मुक्त रखा जाये। इसके लिए अंग्रेज को युद्ध में शिकस्त देना ही एक रास्ता था। हर बिन्दुओं पर व्यापक विचार विमर्श के बाद तय हुआ कि अवध क्षेत्र के सभी राजे रजवाडे जमीदार और नवाब की पूरी सैनिक शक्ति को गठबंधन का रूप देकर अंग्रेजों से मोर्चा लिया जाय। सहमति के उपरान्त अवध मुक्त सेना का गठन हुआ। बैठक में तय हुआ कि सभी लोग अपनी-अपनी सेना, रसद, युद्ध के साजो सामान के साथ जून के प्रथम पखवारे में महादेवा में एकत्र होगे। बैठक समाप्त हो गई। लोग अपने-अपने स्थान के लिए प्रस्थान कर गए।
तयशुदा समय पर बैठक में उपस्थित रहे सभी सूबेदार राजा सैनिकों के साथ महादेव पहुंच गए। प्रातः बेगम साहिबा ने स्वर्ण कलश पर एक जोड़ा पान रखवा दिया। तात्पर्य यह था कि पान उठाने वाला संयुक्त सेना का प्रधान सेनापति होगा। उसी के अगुवाई में युद्ध होना था। प्रातः से शाम की बेला आने को हो गई लेकिन किसी शूरवीर ने पान नहीं उठाया। तो मल्लिका अधीर हो उठी। विचलित बेगम की हालत बलभद्र सिंह से देखी न गई और स्वयं पान का भक्षण कर प्रधान सेनापति का पद स्वीकार कर लिया। बेगम हजरत महल ने बलभद्र के साहस से मुग्ध होकर गले लगा लिया। अवध महारथियों ने निष्कर्ष निकाला कि अवध की सेना लखनऊ अंग्रेजी छावनी रेजीडेन्सी पर अचानक आक्रमण बोलकर छावनी ध्वस्त कर कब्जा कर लिया जाय।
दुर्भाग्य ही था कि रेजीडेन्सी पर आक्रमण की सूचना सर होपग्रान्ट को मिल गई। अवध संयुक्त सेना के बारे में किसी देशद्रोह ने उस खेमें में पहुंचा दी। होपग्रांट ने निर्णय लिया कि अवध की सेना रेजीडेन्सी पहुंचे उससे पहले ही विरोधी को कुचल दिया जाय। होपग्रांट ने बाराबंकी के ओबरी जंगल के रेठ नदी पर जबरदस्त किलेबंदी कर ली।
बलभद्र सिंह के नेतृत्व में अवध की सेना रेजीडेन्सी के लिए कूच कर गई। रेठ नदी पर ही दोनों सेनाओं के बीच 12 जून 1857 को युद्ध प्रारम्भ हो गया। 18 वर्षीय तरूण सेनापति बलभद्र सिंह गजब क्षमता से युद्ध किया। भारी रक्तपात हुआ। कम्पनी सरकार के सभी सैनिक मारे गए। अंग्रेजी सेनाधिकारी जान बचाकर भाग खड़े हुए। अवध की विजयी सेना ने अंग्रेजों के तोप, रसद, सैन्य साजो सामान अपने खेमे में उठा लाये। विजय श्री की सूचना पाकर मल्लिका बहुत खुश हुई। घायल सैनिकों के उपचार के लिए सुरक्षित स्थानों पर भेज दिया गया। तस्वीर काफी हद तक साफ हो गई थी कि अंग्रेज हुक्मरान इतनी जल्दी हार नही मानेगे। इधर रात में ही कम्पनी सरकार के प्रधान सेनापति होपग्रांट ने अपने अन्य छावनियों से भारी संख्या में सैनिक एवं युद्ध के साजो सामान एकत्र कर अलह सुबह रेठ नदी पर मोर्चा बंदी कर लिया।
13 जून को एक बार फिर देानेां पक्ष की सेनाए आमने सामने हो गई। विकराल युद्ध शुरू हो गया। बलभद्र सिंह अंग्रेम पंक्ति में रहकर ब्रिटिस सैनिकांे का संघार कर रहे थे। यह युद्ध भी अवध सेनाओं के पक्ष में जाने लगा। अंग्रेजी फौजों में भगदड़ मच गई। होपग्रांट के लाख कोशिशों एवं प्रलोभनों के बाद भी उसके सैनिक मोर्चा छोड़ रहे थे।
ब्रतानियां हुकूमत के सभी सैन्य अधिकारी चारो ओर से घिर चुके थे। मौत चंद कदमों पर लमहों की आहट देने लगी। तभी होपग्रांट ने छल का सहारा लिया। निहत्थे बलभद्र के सामने जाकर पूछा आप लोग युद्ध बंद कर दीजिए आपकी शर्तें मान रहा हूं। बलभद्र सिंह झांसे में आ गए। युद्ध बंद करने का हुक्म दिया। शर्तो में वाजिद अली शाह की रिहाई, अवध क्षत्र मुक्त तथा रेजीडेन्सी खाली करने को कहा। होपग्रांट राजी हो गया। बलभद्र सिंह ने हथियार रख दिए। जिसका फायदा उठाकर अंग्रेज सैन्य अधिकारी ने बलभद्र सिंह के गर्दन पर पीछे से तलवार से प्रहार कर दिया। जिससे सर धड़ से अलग हो गया। किवदंतियां है कि बलभद्र सिंह का रूण्ड काफी देर तक घनघोर युद्ध किया। जब एक महिला ने काला कपड़े का स्पर्श कराया तब धड़ गिरा और धोखे से जीतते-जीतते अवध सेना हार गई। बलभद्र सिंह शहीद होते ही अवध की सेनाए मोर्चा छोड़कर भाग गई लेकिन चहलारी के सभी जवान अंतिम सांसो तक युद्ध करके शहीद हो गए। चहलारी सम्राट 18 साल तीन दिन की उम्र में भारत ही नहीं ब्रिटिश में भी भूरि-भूरि प्रंशसा के पात्र बने। तरूण सम्राट बलभद्र सिंह तो देश की आन बान शान पर शहीद हो गए लेकिन यह पंक्तियां ‘‘इस धरा का हर तरफ सम्मान है तुमसे, सूर्यवंशी पूर्वजों की आन है तुमसे। पीढ़ियों तक यश तुम्हारा मिट न पायेगा, विश्व में चहलार की पहचान है तुमसे।‘‘ सुखद स्मृति में 13 जून को सदैव सदिया हर सदियां उल्लास का एहसास कराती रहेगी।