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: बाघों के प्राकृतिकवास कतर्नियाघाट में बढ़ा बाघों का कुंनबा, चार वर्षों में बाघों की संख्या हुई दुगनी

अखिल भारतीय बाघ गणना की रिपोर्ट में 29 से 59 हुई संख्या
शिकारियों के नेटवर्क को तोड़ने में सफल रहे वनकर्मी
बहराइच। विश्व बाघ दिवस के अवसर पर राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण भारत सरकार ने अखिल भारतीय बाघ गणना की रिपोर्ट को जारी किया है। इस रिपोर्ट के अनुसार दुधवा टाईगर रिजर्व अंतर्गत कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग बहराइच में बाघों की संख्या 59 बताई गई है। इससे पहले वर्ष 2018 की गणना रिपोर्ट के अनुसार इस क्षेत्र में बाघों की संख्या 29 थी। गौरतलब हो कि भारत सरकार भारतीय वन्यजीव संस्थान द्वारा पूरे भारत में प्रत्येक चार वर्ष पर गणना कार्य कराती है। कतर्नियाघाट का विलय दुधवा टाइगर रिजर्व में वर्ष 2003 में हुआ। इससे पहले इसका दर्जा केवल वन्यजीव अभ्यारण्य का था। वर्ष 2004-05 से बाघ संरक्षण का काम सही मानों में तत्कालीन प्रभागीय वनाधिकारी रमेश पाण्डेय के नेतृत्व में शुरू किया। जहाँ पर इक्का दुक्का बाघ बचे थे। लकड़ी माफियाओं, बावरिया गिरोह एंव संसारचंद गिरोह का बोलबाला था। श्री पाण्डेय द्वारा कई बाघों के शिकार के मामले उजागर किए गए और बावरिया गिरोह के नेटवर्क तोड़ने का श्रेय उन्ही को जाता है। उनके द्वारा अपने स्टाफ की क्षमता विकास को मजबूत किया गया। वन कर्मियों को संगठित कर पैदल गश्त के लिए प्रेरित किया गया। बाघों की निगरानी के लिए सर्विलांस सिस्टम विकसित किया गया। डब्लूडब्लूएफ की मदद से स्थानीय समुदाय को बाघों के संरक्षण के लिए जागरूक कर सहयोग लिया गया। बुनियादी ढांचे का विकास कर वनकर्मियों को सुविधाए उपलब्ध कराई गई। नेपाल राष्ट्र के वनाधिकारियों और एसएसबी से समन्वय स्थापित कर सीमा पार शिकारियों पर नियंत्रण किया गया और मुखबिर तंत्र विकसित किया गया। कतर्नियाघाट क्षेत्र में वन्यजीव विशेषज्ञों से समन्वय स्थापित कर वन्यजीव प्रकृतिकवास प्रबंधन पर कार्य शुरू किया गया। जिसके फलस्वरूप बाघों के आहार शाकाहारी वन्य पशुओं की संख्या में वृद्धि हुआ। हालांकि इसके पीछे वनाधिकारियों और वनकर्मियों को व्यक्तिगत तौर पर कड़ी मेहनत, सुख सुविधाओं को त्याग और माफिया लोगों के विरोध एंव लंबे संघर्ष का सामना करना पड़ा। परन्तु इन लोगों ने हिम्मत नही हरी और कई लोगों के ऊपर कड़ी कार्रवाई हुई। शिकारी बड़ी संख्या में जेल भेजे गए। इसके पश्चात कतर्नियाघाट का नाम पर्यटन के क्षेत्र में अपने अनूठे सुंदरता और दुर्लभ वन्यजीवों के लिए प्रसिद्ध हो गया और बाद में आए सारे वनाधिकारियों द्वारा 10-15 वर्षों में कड़ी मेहनत से इस शानदार प्रजाति को बचाकर एक ऐसी स्थिति में पहुँचाया गया है जहां इस संख्या पर लोग आश्चर्य कर रहें हैं। इस अवधि में इस इलाके में काम करने वाले वन विभाग के लोग, स्थानीय समुदाय के लोग, बाघ संरक्षण में कार्य करने वाली संस्थाएं गर्व का अनुभव कर रही है। डब्लूडब्लूएफ के वरिष्ठ परियोजना अधिकारी सै. दबीर हसन लंबे समय से बाघ संरक्षण कार्य से जुड़े हैं और इस क्षेत्र में कई बदलावों के गवाह हैं। उनका कहना है कि इतनी बड़ी संख्या में बाघों की उपस्थिति इस क्षेत्र के लिए एक उपलब्धि है। इसको बरकरार रखने के लिए बाघों के आवागमन के गलियारे, बाघों के भोजन शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या में वृद्धि, जंगलों में पानी की उपलब्धता और बाघों के रहने के लिए घने फॉरेस्ट को बरकरार रखना होगा। जिससे बाघ भोजन या पानी की तलाश में गांवों में न जाए और मानव बाघ संघर्ष की स्थिति न उत्पन्न हो सके। वर्ष 2021 में इस प्रभाग में आकाशदीप बधावन आईएफएस की तैनाती हुई। जोकि एक युवा और तेज तर्रार अधिकारी हैं। इन्होंने वन्यजीव संरक्षण के लिए विशेष प्रयास किया। बाघों के प्राकृतिक आवास का प्रबंधन स्पेशल टाईगर प्रोटेक्शन फोर्स एवं वनकर्मियों से नियमित गश्त और तलाशी अभियान, वन भूमि पर अतिक्रमण रोकना, वन अपराधियों पर कड़ी कार्यवाही, ग्रामीणों से संवाद और लगातार जागरूकता कार्यक्रम, इको पर्यटन गतिविधियों से ग्रामीणों को जोड़ने, नेपाल राष्ट्र के अधिकारियों, एसएसबी, स्थानीय पुलिस से समन्वय कर बाघों की संख्या में इजाफा कर इस कतर्नियाघाट वन्यजीव प्रभाग का नाम भारत के चुनिंदा संरक्षित क्षेत्र की श्रेणी में पहुंचा दिया है।

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