अतीत की यादें रह गई सावन में कजरी व झूला गीत : अब न तो धान रोपाई के समय कहीं कजरी गीत सुनाई दे रहे हैं और न तो कहीं झूला गीत
Kunwar Diwakar Singh
Mon, Jul 14, 2025
रमेश गिरी
महसी, बहराइच। करीब दो दशक पूर्व सावन माह में बादलों की गोद से निकलती नन्हीं-नन्हीं बूंदों की पड़ती झीनीं-झीनीं फुहारें व चलती मंद-मंद पुरवाई हवा के बीच गांव की महिलाएं खेतों में धान की रोपाई करते समय झुंडो में ‘‘लक्षमण कहाँ सिया जी होईहैं ऐसी विकट अंधेरिया नाय‘‘ आदि गीतों का गायन करती थीं। जिनका पुरुष भी गायन में साथ देते थे। वहीं गांव के भीतर अथवा बाहर लगे पेड़ों में झूला डाल कर खासकर महिलायें देर रात तक ‘‘झूला पड़ा लेवंग केरी डारी झूलैं कृष्ण मुरारी नाय‘‘ आदि मनोहारी मौसमी कजरी गीत प्रस्तुत करती थीं, तो आस-पास का वातावरण मानों खुशनुमा हो जाता था। अब न तो धान रोपाई के समय कहीं कजरी गीत सुनाई दे रहे हैं और न तो कहीं झूला गीत। इस भाग-दौड़ भरी जिंदगी में लोग शायद इतना व्यस्त हो गये हैं कि किसी के पास रोटी कपड़ा मकान से आगे सोचने का समय ही नहीं है। या यूं कहिए कि दो ढाई दशक पूर्व से गांवो की राजनीति के कारण वैमनस्ता इतनी बढ़ी है कि कोई किसी के पास बैठना पसंद नहीं करता। परिणाम स्वरूप आपसी संवाद में कमीं आई है, जिसका खासा असर ग्रामीण परिवेश पर भी पड़ा है।
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