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: भक्तभाव से मनाई गई कार्तिक पूर्णिमा

लगे मेले, श्रद्धालुओं ने किया नदी, झीलों में स्नान
बहराइच। जिले में कार्तिक पूर्णिमा का पर्व सोमवार को हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। मंदिरों व घरों में पूजा-पाठ आयोजित किये गए। श्रद्धालुओं ने नदियों, झीलों में स्नान कर दान पुण्य किया। विभिन्न क्षेत्रों में प्रत्येक वर्षों की भांति इस वर्ष भी मेले लगे। जहां पर भारी संख्या में श्रद्धालुओं ने पहुंचकर आमद दर्ज करायी। नगर के गोलवाघाट, चित्तौरा झील, कुट्टी बाजार सहित कई अन्य जगहों पर प्रतिवर्षों की भांति इस वर्ष भी मेले लगे। जिसमें भारी संख्या में श्रद्धालुओं ने पहुंचकर खरीददारी की। रिसिया संवादसूत्र के अनुसार कर्तिक पूर्णिमा के अवसर पर क्षेत्र के विश्राम घाट, सरयू घाट व नरसिंहडीहा बाग पर मेले लगे। प्रातःसे ही लोगों द्वारा पूजा-पाठ आरम्भ कर दिया गया था। पुलिस द्वारा सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त किये गए थे। बलहा संवादसूत्र के अनुसार क्षेत्र में कार्तिक पूर्णिमा का पर्व परम्परागत एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। स्थानीय सरयू तट हाड़ा गंगापुर के निकट कागभुसुण्डी आश्रम पर वृहद रूप से मेला लगा। जिसमें भारी संख्या में लोगों ने उपस्थिति दर्ज करायी। सरयू तट पर हजारों बच्चों एवं महिलाओं ने स्नान कर पूजन-अर्चन व दान पुण्य किया। सोमवार को प्रातःसे ही सरयू तट पर स्नान का सिलसिला शुरू हुआ। जो सायंकाल तक चलता रहा। शांतिपूर्वक पूर्णिमा का पर्व सम्पन्न हुआ।

क्यों मनाई जाती है कार्तिक पूर्णिमा
बहराइच। कार्तिक माह की पूर्णिमा का अपना एक विशेष महत्व है। हिंदू पंचाग के अनुसार साल का आठवां महींना कार्तिक महींना होता है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा कार्तिक पूर्णिमा कहलाती है। प्रत्येक वर्ष पन्द्रह पूर्णिमाएं होती है। जब अधिकमास या मलमास आता है तब इनकी संख्या बढ़कर सोलह हो जाती है। सृष्टि के आरंभ से ही इस तिथि का अपना अलग महत्व रहा है। पुराणों में इस दिन स्नान, व्रत व पूजा-पाठ करने से माक्ष मिलने वाला बताया गया है। इसका महत्व सिर्फ वैष्णव भक्तों के लिए ही नहीं शैव भक्तों और सिख धर्म के लिए भी बहुत ज्यादा है। विष्णु के भक्तों के लिए यह दिन इसलिए खास है क्योंकि भगवान विष्णु का पहला अवतार इसी दिन हुआ था। क्योंकि भगवान विष्णु का पहला अवतार इसी दिन हुआ था। प्रथम अवतार में भगवान विष्णु मत्स्य यानी मछली के रूप में थे। भगवान को यह अवतार वेदों की रक्षा, प्रलय के अंत तक सप्त़़़़ऋषियों, अनाजों एवं राजा सत्यव्रत की रक्षा के लिए लेना पड़ा था। इससे सृष्टि का निर्माण कार्य फिर से आसान हुआ। शिव भक्तों के अनुसार इसी दिन भगवान भोलेनाथ ने त्रिपुरासुर नामक महाभयानक असुर का संहार किया था। जिससे वह त्रिपुरारी के रूप में पूजित हुए। इससे देवगण बहुत प्रसन्न हुए और भगवान विष्णु ने शिव जी को त्रिपुरारी नाम दिया जो शिव के अनेक नामों में से एक है। इसलिए इसे त्रिपुरी पूर्णिमाश भी कहते है। पुराणों के अनुसार कार्तिक पूर्णिमा के दिन गंगा स्नान, दीपदान, अन्य दानों आदि का विशेष महत्व है। एक मान्यता यह भी है कि इस दिन कृतिका में शिव शंकर के दर्शन करने से सात जन्म तक व्यक्ति ज्ञानी और धनवान होता है। इस दिन चन्द्र जब आकाश में उदित हो रहा हो उस समय शिवा संभूति संतति प्रीति अनुसुईया और क्षमा इन छह कृतिकाओं का पूजन करने से शिव जी प्रसन्न होकर भक्तों की मनोकामना पूर्ण करते है।

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