श्रद्धालुओं ने देवोत्थानी एकादशी का व्रत रखकर की पूजा-अर्चन : गन्ना, सिघाड़ा व मूली की जमकर हुई खरीददारी
Kunwar Diwakar Singh
Sat, Nov 1, 2025
बहराइच। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाने वाला पर्व देवोत्थानी एकादशी अन्य एकादशी की अपेक्षा अधिक महत्व रखती है। इसका प्रमुख कारण है कि इस दिन सृष्टि के पालन हार भगवान विष्णु चार महींने की निद्रा के बाद जागते है। इसलिए इसे देवताओं के जागने का भी दिन कहा जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में इसे देवउठनी या देवोत्थानी एकादशी के नाम से जाना जाता है। दीपावली के 11 दिन बाद देव प्रबोध उत्सव को देवोत्थानी एकादशी के रूप में मनाया जाता है। इस रात क्षीर सागर में शयन कर रहे श्री हरि विष्णु को जगाकर उनसे मांगलिक कार्य आरम्भ कराने की प्रार्थना की जाती है और गन्ना, सिंघाड़ा, आंवला, चने की भाजी, मूली समेत अन्य मौसमी फलों व सब्जियों के साथ पकवान के भोग अर्पित किये जाते है। आंगन में गन्ने के मण्डप बनाकर उसके नीचे सालिगराम की प्रतिमा व तुलसी का पौधा रखकर उनका विवाह कराया जाता है और मण्डप की परिक्रमा कर ईश्वर से कुंवारों के विवाह और विवाहितों के गौना कराने की प्रार्थना की जाती है। दीप मालिकाओं से घरों को रोशन कर पटाखे जलाते हुए खुशियां और लगन मुर्हूत शुरू हो जायेगा। इस पर्व के संबंध में एक किवंदन्ति है कि पदम पुराण के मुताबिक भगवान विष्णु के दो रूप् बीते चार महींनों के दौरान अलग-अलग स्थानों पर वास करते है। उनका स्वरूप राजा बलि के पास पाताल लोग में और दूसरा क्षीर सागर में शेषनाग की शैया पर शयन करता है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान विष्णु अपने लोक में लौटते है इसलिए बीते चार महींनों के दौरान विवाह आदि शुभ कार्य नहीं किये जाते है। एकादशी पर्व पर अयोध्या से पंचकोसी परिक्रमा करने के बाद लौटे श्रद्धालुआंे समेत सभी हिन्दू परिवारों ने इस पर्व पर दिन भर व्रत रखकर सायं आंगन में मण्डप बनाकर विधिवत पूजन-अर्चन के बाद देर रात तक आरती, कीर्तन भजन चलते रहे।
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