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देवउठनी एकादशी आजः आचार्य रमेश चंद्र शास्त्री : देवउठनी एकादशी पूजा विधि

Kunwar Diwakar Singh

Fri, Oct 31, 2025

बहराइच। कार्तिक शुक्ल पक्ष एकादशी को देव प्रबोधिनी एकादशी कहते हैं। शास्त्रों के अनुसार दीपावली के बाद आने वाली इस एकादशी को देवउस्थान, देव प्रबोधिनी एवं देवउठनी एकादशी भी कहते हैं। भगवान विष्णु आषाढ़ शुक्ल एकादशी को चार माह के लिए क्षीरसागर में शयन करते हैं। 4 महीने पश्चात कार्तिक शुक्ल एकादशी को जगाते हैं विष्णु जी के शयन काल के चार माह तक विवाह एवं मांगलिक कार्यों का आयोजन निषेध है। नारायण की जागृति के पश्चात सभी मांगलिक कार्य शुरू किए जाते हैं। तुलसी विवाह कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को तुलसी पूजन का उत्सव पूरे भारत वर्ष मे मनाया जाता है। कहा जाता है कि कार्तिक मास में जो मनुष्य तुलसी का विवाह भगवान नारायण से करते हैं उनके पिछले जन्मों के सब पाप नष्ट हो जाते हैं। कार्तिक माह में स्नान करने वाली महिलाएं कार्तिक शुक्ल एकादशी को शालिग्राम और तुलसी का विवाह करती है। समस्त विधि विधान पूर्वक एक सुंदर मंडप के नीचे संपन्न करती है। विवाह के समय स्त्रियां गीत तथा भजन गाती है। दरअसल तुलसी को विष्णु प्रिया भी कहते हैं। तुलसी विवाह के लिए एकादशी को व्रत एवं पूजन कर अगले दिन तुलसी का पौधा किसी ब्राह्मण को देना शुभ होता है लेकिन लोग एकादशी से पूर्णिया तक तुलसी पूजन करके पांचवें दिन तुलसी का विवाह करते हैं। तुलसी विवाह की यही पद्धति बहुत प्रचलित है।

01 नवंबर को एकादशी का व्रत

सद्गृहस्थियों एवं महाभागवत वैष्णवजन, साधू-सन्यासी, योगी, जती, विधवा स्त्रियाँ व्रत समस्त लोगों के लिए।

काशी का शुद्ध महावीर

पंचांग के अनुसार, देवउठनी एकादशी तिथि का आरंभ 1 नवंबर को सुबह 4 बजकर 02 मिनट पर होगा और 2 तारीख को रात में 02 बजकर 57 मिनट तक रहेगी।

देवउठनी एकादशी पूजा विधि

बहराइच। इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। इस दिन विशेष रुप से पीले रंग के वस्त्र धारण करें। इसके बाद भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी का ध्यान करें। पूजा स्थल को अच्छे से साफ करके भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की प्रतिमा स्थापित करें। अब गंगाजल से उन्हें स्नान कराएं। अब पीला चंदन, पीले फूल, और पंचामृत का भोग लगाएं। इसके बाद दीपक जलाकर व्रत कथा सुने और अंत में आरती करके पूजा संपन्न करें।

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