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श्रद्धा के साथ मनाई गई गुरू पूर्णिमा, लगे मेले : श्रद्धालुओं ने पूजा-पाठ कर किया दान-पुण्य

Kunwar Diwakar Singh

Thu, Jul 10, 2025

ब्हराइच। जिले में गुरूपूर्णिमा का पर्व धूमधाम से मनाया गया। लोगों ने नदियों, सरोवरों में स्नान कर विधि विधान से मंदिरों में पूजन-अर्चन कर दान पुण्य किया। मंदिरों में पूजा-पाठ के लिए भक्तों की भीड़ लगी रही। सत्यनारायण व्रत कथा सुन पुण्य के भागी बने। भारी संख्या में भक्तों ने पहुंचकर सत्यनारायण कथा का श्रवण किया। शहर के सिद्धनाथ मंदिर सहित अन्य मंदिरों में भारी संख्या में श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगा। प्रतिवर्षों की भांति इस वर्ष भी निर्धारित मेले लगे। जिसमें भारी संख्या में क्षेत्रीय लोगों ने पहुंचकर शिकरत किया। लोगों ने घरों में सत्यनारायण व्रत कथा का श्रवण किया व सिद्धनाथ मंदिर में सुबह से ही भक्तों ने पहुंचकर भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक किया। विकास खण्ड चित्तौरा के बेरिया मंदिर पर इस वर्ष भी विशाल मेला लगा। जिसमें दूर दराज से भारी संख्या लोगों ने पहुंचकर शिकरत की। मंदिर में प्रसाद चढ़ाकर मन्नत मांगी व मेले में खरीददारी की। भारी संख्या में क्षेत्रीय लोग मेले में पहुंचे। दूर-दूर से दुकानदारों ने पहुंचकर सुबह से ही मेले में अपनी दुकाने सजा रखी थी। मेले में लोगों ने जमकर खरीददारी की। मेला परिसर में कोतवाली देहात पुलिस द्वारा मेले में कोई आवंछित गतिविधि न हो इसके लिए सर्तक रही। चौकी प्रभारी चिलविरिया अपने हमराहियों के साथ सुरक्षा व्यवस्था में लगे रहे। वहीं पुलिस लाइन स्थित छोटी बेरिया पर भी प्रतिवर्षों की भांति इस वर्ष भी मेले का आयोजन हुआ। जिसमें स्थानीय लोगों सहित पास पड़ोस के गांवों के लोगों ने शिकरत कर खरीददारी की। मेले के मद्देनजर पुलिस प्रशासन भी मुस्तैद रहा। गौरतलब हो कि शास्त्रों के अनुसार आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरू पूर्णिमा कहते है। इस दिन गुरू पूजा का विधान है। गुरू पूर्णिमा वर्षा ऋतु के शुरूआत में पड़ती है। मौसम के लिहाज से चार महींने श्रेष्ठ होते है। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए है। पुराणों के अनुसार गुरूपूर्णिमा महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्हें चारों वेदों का भी रचना की थी। इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरू कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरू पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। गुरू तथा देवता में समानता के लिए एक श्लोक में कहा गया है कि जैसी भक्ति की आवश्यकता देवता के लिए है वैसी ही गुरू के लिए भी। देश भर में गुरू पूर्णिमा का पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता हैं। प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरू के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था तो इसी दिन श्रद्धा भाव से प्रेरित होकर अपने गुरू का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति सामर्थ्यानुसार दक्षिणा देकर कृतकृत्य होता था। आज भी इसका महत्व कम नहीं हुआ है। पारम्परिक रूप से शिक्षा देने वाले विद्यालयों में संगीत और कला के विद्यार्थियों में आज भी यह दिन गुरू को सम्मानित करने का होता है। शास्त्रों की मान्यताओं के अनुसार ऐसा मानना है कि अपने उज्जवल भविष्य के लिए गुरू का आर्शीवाद जरूर ग्रहण करना चाहिए। इस दिन अपने गुरूओं के दर्शन कर जीवन को आलोकित करने का अवसर भी माना जाता है। हर साल गुरू पूर्णिमा के अवसर पर लोग श्रद्धापूर्वक अपने गुरू का स्मरण करते हुए पूजा-अर्चना में लीन रहते है। वैसे भी भारतीय संस्कृति में कहा गया है कि ब्रम्हा और शंकर जैसा व्यक्ति भी गुरू के बिना संसार से पार नहीं उतर सकता है। गुरू पूर्णिमा के अगले दिन सूर्योदय के साथ सावन का महींना शुरू हो जायेगा। यह महीना बाबा भगवान शिव के लिए विशेष होता है।

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